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संतद्वारा जिज्ञासुको उसकी क्षमतानुसार साधना बताना
एक साधुके पास एक जिज्ञासु युवक आया और उसने साधुसे पूछा, ‘‘क्या मुक्ति प्राप्त करनेके लिए वनमें जाना चाहिए ?’’
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विश्वको सुधारना असंभव होनेके कारण स्वयंको सुधारना आवश्यक !
बहुत पहले एक राजाकी पुत्रीके पांवमें कांटा चुभा । साधारणतः राजाएं कुछ प्रमाणमें सनकी होते हैं ।
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वासनामें अटकनेपर प्रगति न होना
एक व्यक्ति गोकुल जानेके लिए निकला । उसे नावमें बैठकर यमुना नदी पार करनी थी; परंतु वह भांगके नशेमें था ।
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एकताका सामर्थ्य
एक स्थानपर धार्मिक कार्यक्रम था । कार्यक्रम समाप्त होनेपर पुरूषमंडली बाहर निकली । महिलाएं भी बाहर निकल रहीं थी । उसी समय दो गोरे आरक्षक मद्य पीकर महिलाओंके व्दारके सामने आकर खडे हो गए ।
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प्रल्हाद कथा
यह कथा श्री वसिष्ठजी द्वारा श्रीरामजीको योगवसिष्ठमें विद्यमान उपशम प्रकरणमें कथन की गई है । इससे यह स्पष्ट होता है कि उपासनाके योगसे ईश्वरकी कृपा प्राप्त कर ज्ञानसंपन्नता आती है और आत्मज्ञान प्राप्त होने हेतु स्वयंके प्रयासों एवं विचारोंकी आवश्यकता है ।
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सत्संगकी महिमा रखने हेतु जडभरतका वैयक्तिक अपमानकी ओर ध्यान न देना
‘एक बार राजा रहूगण पालकीमें बैठकर कपिल मुनिके आश्रम जा
रहे थे । पालकीका एक सेवक अस्वस्थ हो गया ।
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अक्लमंद हंस
एक विशाल पेड था । उसपर सहस्र हंस रहते थे । उनमें एक बुद्धिमान और दूरदर्शी हंस था । उन्हें सभी आदरपूर्वक ‘ताऊ’ कहकर बुलाते थे । पेडके तने पर जडके निकट नीचे लिपटी हुई एक बेलको देखकर ताऊने कहा ‘‘देखो, इस बेलको नष्ट कर दो ।
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संदेह
एक विद्यार्थी था । वह शंकाएं अधिक पूछता था । उसमें भी अनावश्यक शंका ही अधिक पूछता था । वह सदा गुरुको कहता था,‘‘मुझे ईश्वरका दर्शन शीघ्र करवाइए ।
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बालक ध्रुव
राजा उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो भार्याएं थीं । राजा उत्तानपाद के सुनीतिसे ध्रुव तथा सुरुचिसे उत्तम नामक पुत्र हुए ।
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निष्काम भक्तिसे प्रसन्न होकर ईश्वरद्वारा मायाकी अडचनें दूर करना
‘सुदामा श्रीकृष्णसे मिलनेके लिए गए । सुदामाकी पत्नीने सुदामाको श्रीकृष्णसे संपत्ति मांगनेके लिए कहा था ।
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साधनासे संचित और इच्छाका भी नाश होता है
विद्यारण्य स्वामीजीकी आर्थिक परिस्थिति विकट (खराब) थी; इसलिए धनप्राप्तिके लिए उन्होंने गायत्री मंत्रके २४ पुनश्चरण किये; परंतु धनप्राप्ति नहीं हुई ।
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